कुशीनगर :: अवैध अस्पतालों के मकड़जाल में नवजातों की मौतों का सिलसिला बदस्तूर जारी
🔴 आशाओं और सरकारी अस्पतालों से प्राइवेट अस्पतालों की सांठगांठ उजागर होने पर भी नहीं होती कोई कार्यवाही। 🔴 निजी अस्पताल में नवजात की मौत व प्रसुता की गंभीर हालत में रेफर करने से भड़के परिजन। 🔴 ऑपरेशन और अस्पताल प्रबंधन पर परिजनों ने लगाया गंभीर आरोप।
सतेन्द्र पाण्डेय, कुशीनगर केसरी, कुशीनगर। कप्तानगंज में प्रसव के दौरान नवजात की मौत और जच्चा की नाजुक हालत ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। डीसीएफ चौक स्थित तिरुपति हॉस्पिटल में हुए इलाज के बाद सामने आए इस मामले ने निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली, रेफरल व्यवस्था और स्वास्थ्य विभाग से सांठ-गांठ की हकीकत उजागर कर दी है।
बताते चलें कि रामपुर माफी गांव निवासी मुंजेश कुमार कनौजिया के अनुसार उनकी पत्नी पूजा देवी को 7 फरवरी को प्रसव पीड़ा हुई। गांव की आशा कार्यकर्ता रागिनी देवी उन्हें पहले बोदरवार स्थित सरकारी अस्पताल ले गईं, जहां प्रसव नहीं हो सका। वहां मौजूद एएनएम ने महिला की हालत गंभीर बताते हुए उसे निजी अस्पताल जाने का परामर्श दिया और तिरुपति हास्पीटल का नाम सुझाया।
वहीं परिजनों का आरोप है कि उक्त अस्पताल में डॉक्टरों ने ऑपरेशन किया, लेकिन तब तक गर्भ में ही शिशु की मौत हो चुकी थी। उनका कहना है कि समय पर उचित उपचार नहीं मिला और ऑपरेशन के दौरान लापरवाही बरती गई, जिससे जच्चा की हालत और बिगड़ गई। हालत गंभीर होने पर अस्पताल प्रबंधन ने उसे गोरखपुर रेफर कर दिया, जहां जांच में कथित तौर पर आंतरिक क्षति की बात सामने आई। फिलहाल महिला एक निजी अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही है।
परिजनों का यह भी आरोप है कि बच्चे की मौत पहले ही हो चुकी थी, इसके बावजूद अस्पताल ने इलाज के नाम पर करीब 25 हजार रुपये वसूले। अस्पताल द्वारा दिखाए गए कथित सहमति पत्र को परिवार ने फर्जी बताते हुए इसे जिम्मेदारी से बचने की कोशिश बताया है।
घटना के बाद बड़ी संख्या में ग्रामीण अस्पताल पहुंच गए और लापरवाही का आरोप लगाते हुए जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। जिला पंचायत सदस्य रामचंद्र पासवान, कैलाश चंद, संजय सिंह, हिरदेश कनौजिया, पूर्व प्रधान राज कपूर सिंह, आनंद चौरसिया, रितेश कुमार और मुन्ना गुप्ता सहित कई लोगों ने अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ नारेबाजी की। पुलिस को मौके पर पहुंचकर हालात संभालने पड़े। अस्पताल प्रबंधन की ओर से डॉ. अंगद चौधरी ने सभी आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि इलाज में कोई लापरवाही नहीं हुई और मरीज को मेडिकल स्थिति के अनुसार हीं रेफर किया गया था। वहीं पीड़ित परिवार ने एसडीएम, मुख्य चिकित्साधिकारी और पुलिस को तहरीर देकर आशा कार्यकर्ता, एएनएम और संबंधित चिकित्सकों की भूमिका की निष्पक्ष जांच, दोषियों पर कड़ी कार्यवाही और मुआवजे की मांग की है। वहीं पुरे मामले में स्थानीय सीएचसी प्रभारी सहित जिला चिकित्साधिकारी का उदासीन रवैया देखने को मिला।
बता दें जिलाधिकारी के आदेश के बावजूद सीएचसी पर मात्र पांच हीं रजिस्टर्ड अस्पतालों की सूची लगी है। जबकि क्षेत्र में दर्जनों निजी अस्पताल बिना रजिस्ट्रेशन के धड़ल्ले से चल रहे हैं और जनपद में इनकी संख्या हजारों में हो सकती है। सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि रजिस्टर्ड अस्पतालों की सूची में तिरुपति हास्पीटल का नाम न होने के बावजूद भी सीएचसी से मात्र कुछ हीं दूरी पर आखिर किसके अनुमति से यह अस्पताल संचालित हो रहे हैं, यह भी जांच का विषय है। वहीं कप्तानगंज थानाध्यक्ष दीपक सिंह से जब मामले की जानकारी लेने का प्रयास किया गया तो उन्होंने मीटिंग में शामिल होने की बात कही।
वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि जिले में बिना सख्त निगरानी तथा बिना उचित दस्तावेजों के कई निजी अस्पताल संचालित हो रहे हैं, जहां आए दिन लापरवाही और मौत के आरोप सामने आते हैं। यह मामला अब केवल एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है। अब पूरे जिले की निगाह जांच पर है, क्योंकि सच्चाई सामने आई तो व्यवस्था बदलेगी, वरना ऐसी त्रासदियां यूं हीं दोहराती रहेंगी।
