देवरिया :: क्षेत्र में माँ दुर्गा के चौथे स्वरूप की हुई पूजा अर्चना

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🟣 रोग और शोक का नाश करती है माँ कुष्मांडा – मंदीप तिवारी

डेस्क कुशीनगर केसरी, बघौचघाट – देवरिया। शारदीय नवरात्रि में चौथे दिन देवी कुष्मांडा के रूप में पूजा की गई। विधानसभा क्षेत्र पथरदेवा में शारदीय नवरात्रि के अवसर पर माँ दुर्गा की मूर्ति स्थापित कर उनके चौथे स्वरूप की पूजा व उपासना की गई।
वहीं इस क्रम में थाना क्षेत्र बघौचघाट के हाजिमार्केट में माँ अंबे कारतूस क्लब नंबर 1 के द्वारा माता के समस्त स्वरूप की प्रतिमा रखकर चौथे दिन माँ कुष्मांडा की उपासना करते हुए विधि विधान से पूजा अर्चना चंद्रशेखर उर्फ सोनू जायसवाल पुत्र स्वर्गीय मुनीब जायसवाल के द्वारा कराई गई, माँ अंबे कारतूस क्लब समिती से माहीवाल जायसवाल , राकेश जायसवाल, त्रियोगी जायसवाल, राजकुमार जायसवाल, महेंद्र जायसवाल, मनोज कुमार, पंडित – श्रीनिवास शात्री सहित समिति के लोग उपस्थित रहे तथा पूजा अर्चना कर प्रसाद वितरण किये, इसीक्रम में क्षेत्रिय विधायक, नेता, मंत्री व कार्यकर्ताओं सहित ग्रामीणों के द्वारा भी गृह स्थान पर कलश रखकर एवं दूर दूर के मंदिर तक विधि विधान से पूजा अर्चना की गई। इसक्रम में प्रदेश कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही, पूर्व मंत्री ब्रह्माशंकर, नर्मदेश्वर मंदिर अध्यक्ष – सुरेंद्र लाल श्रीवास्तव, पूर्व ब्लाक प्रमुख अभिषेक त्रिपाठी, संजय सिंह, पथरदेवा-सोनू जायसवाल, कुँवर राय, क्रांति सिंह, सुजीत प्रताप सिंह, अनिल प्रसाद, जीपु शाही, सरोज कुमार मिश्र, ध्रुपदेव शाही, मुरारी मोहन शाही, अजय कुमार शाही, अजय कुमार यादव, रामबेलाश यादव, मृत्युंजय यादव, भैरव यादव, राकेश राय, प्रेम चंद सिंह कुशवाहा , विनोद सिंह कुशवाहा, यूगुल किशोर तिवारी, आचार्य राजू मिश्र, पत्रकार – राजू प्रसाद श्रीवास्तव सहित उपर्युक्त पक्ष – विपक्ष के नेता , कार्यकर्ता, समाजसेवी व ग्रामीणो के द्वारा क्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर भगवती की उपासना की गई। माता के महिमा के संदर्भ में पथरदेवा निवासी पंडित मंदीप तिवारी ने बताया कि माँ का स्वरूप अति मनमोहक होता है। अपनी मंद, हल्की हंसी के द्वारा अण्ड यानी ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इस देवी को कुष्मांडा नाम से अभिहित किया गया है। आगे बताया जब सृष्टि नहीं थी, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार था, तब इसी देवी ने अपने ईषत्‌ हास्य से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसीलिए इसे सृष्टि की आदिस्वरूपा या आदिशक्ति कहा गया है। आगे बताया कि पुराणों के अनुसार माँ देवी की आठ भुजाएं हैं, इसलिए अष्टभुजा कहलाईं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जप माला है। देवी का वाहन सिंह है और इन्हें कुम्हड़े की बलि प्रिय है। संस्कृति में कुम्हड़े को कुष्मांड कहते हैं इसलिए इस देवी को कुष्मांडा। देवी का वास सूर्यमंडल के भीतर लोक में है। सूर्यलोक में रहने की शक्ति क्षमता केवल इन्हीं में है। इसीलिए इनके शरीर की कांति और प्रभा सूर्य की भांति ही दैदीप्यमान है। इनके हीं तेज से दसों दिशाएं आलोकित हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में इन्हीं का तेज व्याप्त है। अचंचल और पवित्र मन से नवरात्रि के चौथे दिन देवी की पूजा-आराधना करने से भक्तों के रोगों और शोकों का नाश होता है तथा उसे आयु, यश, बल और आरोग्य प्राप्त होता है। देवी अत्यल्प सेवा और भक्ति से ही प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती हैं। सच्चे मन से पूजा करने वाले को सुगमता से परम पद प्राप्त होता है। विधि-विधान से पूजा करने पर भक्त को कम समय में ही कृपा का सूक्ष्म भाव अनुभव होने लगता है। ये देवी आधियों-व्याधियों से मुक्त करती हैं और उसे सुख-समृद्धि और उन्नति प्रदान करती हैं। अंतत इस देवी की उपासना में भक्तों को सदैव तत्पर रहना चाहिए। 

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