देवरिया :: अंधकार के समय मे मां कुष्मांडा ने की थी संसार की रचना
🛑 पक्ष और विपक्ष के नेता व कार्यकर्ताओ ने की मां के चौथे रूप की पूजा आराधना….।
राजू प्रसाद श्रीवास्तव, कुशीनगर केसरी, देवरिया। रामनवमी के पावन वेला का आज चौथा दिन है, आज के दिन क्षेत्र के श्रद्धालु ने मा के चौथे स्वरूप की पूजा, उपासना की , तथा अपने परिवार के सुख, शांति व संवृद्ध की कामना करते हुए लोक कल्याण की कामना किया।
वहीं क्षेत्रीय लोगो ने घर, मंदिर तथा दूर प्रदेश तक जाकर माता के भक्ति मे लीन होते देखे गये। विधान सभा 338 पथरदेवा के अंतर्गत कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही, ब्लाक प्रमुख – सुब्रत शाही, प्रधान संग के अध्यक्ष मुरारी मोहन शाही, चेयर मैन क्रांति सिंह, मंडल अध्यक्ष जीपू शाही, जिला पंचायत सदस्य – सुजीत प्रताप सिंह, वरिष्ठ नेता – अजय कुमार शाही, अवधेश कुमार सिंह, संजीतधर द्विवेदी, भाजपा नेता युगुल किशोर तिवारी, दयाशंकर शास्त्री, कुवर राय, अनिल प्रसाद, प्रेम सिंह कुशवाहा, विभूति राय, ध्रुप देव शाही, नवीन कुमार शाही , विवेक दत्त राय, भीम यादव, रामाशीष प्रसाद, वरिष्ठ नेता- संजय सिंह, सोनू जायसवाल पथरदेवा , माहिवाल जायसवाल, सोनू जायसवाल बघौच, पिंटू सरकार, ब्यास ठाकुर कोटवा, प्रधान मुन्ना यादव , राणा प्रताप सिंह, सरोज कुमार मिश्र, राजकुमार जायसवाल, मोती जायसवाल, रंजन श्रीवास्तव, सहित सपा के पूर्व कैबिनेट मंत्री ब्रह्मा शंकर त्रिपाठी, पूर्व ब्लाक प्रतिनिधि संजय कुमार मल्ल, पूर्व ब्लाक प्रमुख अभिषेक त्रिपाठी, सपा नेता – राकेश राय, वरिष्ठ सपा नेता अजय कुमार यादव , ग्राम प्रधान – रामबेलाश यादव , भैरव यादव, सहित तमाम देवी भक्तो के द्वारा पूजा याचना की गई। आप सभी को बतादे की नवरात्रि में चौथे दिन देवी को कुष्मांडा के रूप में पूजा जाता है। अपनी मंद, हल्की हंसी के द्वारा अण्ड यानी ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इस देवी को कुष्मांडा नाम से अभिहित किया गया है। जब सृष्टि नहीं थी, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार था, तब इसी देवी ने अपने ईषत् हास्य से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसीलिए इसे सृष्टि की आदिस्वरूपा या आदिशक्ति कहा गया है।
पुराण कहता है की इस देवी की आठ भुजाएं हैं, इसलिए अष्टभुजा कहलाईं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जप माला है। इस देवी का वाहन सिंह है और इन्हें कुम्हड़े की बलि प्रिय है। संस्कृति में कुम्हड़े को कुष्मांड कहते हैं इसलिए इस देवी को कुष्मांडा। इस देवी का वास सूर्यमंडल के भीतर लोक में है। सूर्यलोक में रहने की शक्ति क्षमता केवल इन्हीं में है। इसीलिए इनके शरीर की कांति और प्रभा सूर्य की भांति ही दैदीप्यमान है। इनके ही तेज से दसों दिशाएं आलोकित हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में इन्हीं का तेज व्याप्त है। मान्यता है की अचंचल और पवित्र मन से नवरात्रि के चौथे दिन इस देवी की पूजा-आराधना करना चाहिए। इससे भक्तों के रोगों और शोकों का नाश होता है तथा उसे आयु, यश, बल और आरोग्य प्राप्त होता है। ये देवी अत्यल्प सेवा और भक्ति से ही प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती हैं। सच्चे मन से पूजा करने वाले को सुगमता से परम पद प्राप्त होता है।
विधि-विधान से पूजा करने पर भक्त को कम समय में ही कृपा का सूक्ष्म भाव अनुभव होने लगता है। ये देवी आधियों-व्याधियों से मुक्त करती हैं और उसे सुख-समृद्धि और उन्नति प्रदान करती हैं। अंततः इस देवी की उपासना में भक्तों को सदैव तत्पर रहना चाहिए।
