कुशीनगर :: मुख्यमंत्री जी ! सुभाष कर रहे हैं फर्जी नौकरी, आखिर कब होगी जांच

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🔴 अनौपचारिक शिक्षा परियोजना में परिचारक थे सुभाष, परियोजना समाप्ति के बाद कैसे बन गये बेसिक विभाग के परिचारक।
🔴 वर्तमान में डीआईओएस कार्यालय में पदोन्नति पाकर बिना पद के कुण्डली जमाये बैठे हैं सुभाष।
🔴 आखिर योजना के समाप्ति के बाद सुभाष यादव बेसिक में कैसे हुए समायोजित।

डेस्क कुशीनगर केसरी, कुशीनगर। जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय में कनिष्क लिपिक से नियम विरुद्ध पदोन्नति पाकर बिना पद के कुण्डली जमाये बैठे सुभाष प्रसाद यादव की नियुक्ति औपचारिक शिक्षा परियोजना में परिचारक के पद पर हुई थी। वहीं जानकारों का कहना है कि जब परियोजना समाप्त हो गया तो फिर सुभाष नौकरी कैसे कर रहे हैं ? क्योंकि उस परिजनों से जुड़े अधिकारियों को उनके मूल पद पर भेज दिया गया या फिर बेसिक शिक्षा के अन्य परियोजनाओं से जोड दिया गया किन्तु परिचारकों परियोजना के समाप्ति के बाद ही बाहर का रास्ता दिखा दिया गया? ऐसे मे सुभाष प्रसाद कही कूटरचित दस्तावेज के सहारे फर्जी नौकरी तो नही कर रहे है यह गहन व निष्पक्ष जांच का विषय है ?
अब गौर करने वाली ये बात है कि सुभाष प्रसाद यादव की नियुक्ति 6 अक्टूबर 1989 मे अनौपचारिक शिक्षा परियोजना मे कसया विकास खण्ड में परिचायक के पद पर हुई थी, उस समय पडोसी जनपद देवरिया मे कुशीनगर जनपद समाहित था।
वहीं सूत्र बताते हैं कि सुभाष यादव की रिश्तेदार परियोजना अधिकारी थी और उन्ही के द्वारा इस परिजन मे सुभाष की नियुक्ति परिचारक के पद पर की गयी थी। कहना ना होगा कि अनौपचारिक शिक्षा योजना का शुभारंभ पूरे देश मे 1985-86 में स्वर्गीय राजीव गांधी के प्रधानमंत्री कार्यकाल में लागू की गई थी, जिसका उद्देश्य स्कूल न जाने वाले बच्चों को शिक्षा प्रदान करना था, जो औपचारिक स्कूल प्रणाली से बाहर थे, विशेष रूप से 8-14 वर्ष की आयु के बच्चे। कसया विकास खण्ड में नियुक्ति के पश्चात सुभाष यादव 16 अप्रैल-2001 तक कार्यरत रहे। मतलब 11 वर्ष 6माह 9दिन इन्होने अपनी सेवा दी। जानकार बताते है कि वर्ष 1999 में अनौपचारिक शिक्षा परियोजना समाप्त हो गया जिसके बाद चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया वही अनौपचारिक शिक्षा के अनुदेशकों को वर्ष 2001 मे सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान में विलय कर दिया। अनौपचारिक शिक्षा अनुदेशक महेश कुमार, रामनरेश भारती व सूर्य प्रकाश ने बताया कि अनौपचारिक शिक्षा परियोजना के समाप्त होने के बाद अनुदेशकों को सर्वशिक्षा अभियान से जोड लिया गया जबकि चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को हटा दिया गया बाद मे सर्व शिक्षा अभियान को भी सरकार ने बंद कर सभी अनुदेशको को भी बेरोजगार बना दिया।
जानकारों के मुताबिक वर्ष 1999 में सरकार ने अनौपचारिक शिक्षा परियोजना समाप्त कर दिया फिर भी सुभाष यादव 16 अप्रैल-2001 तक अनौपचारिक शिक्षा में परिचारक कैसे बने रहे ? जबकि वर्ष 2001 में अनौपचारिक शिक्षा के अनुदेशको को सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान मे विलय कर दिया था सुभाष अनुदेशक नही बल्कि परिचारक थे।
सबसे मजे कि बात यह है कि जब अनौपचारिक शिक्षा को सरकार ने समाप्त किया और इस परियोजना से जुड़े अनुदेशकों को सर्व शिक्षा अभियान से जोड चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया तो फिर 16 अप्रैल-2001 को सुभाष यादव कसया ब्लाक में ही बेसिक विभाग के सहायक बेसिक कार्यालय मे परिचायक कैसे बन गये ? किस शासनादेश के तहत और किस अधिकारी द्वारा सुभाष यादव को अनौपचारिक शिक्षा के परिचायक से बेसिक विभाग का परिचारक बना दिया गया ? गड़बड़झाला है ऐसा जानकारों का दावा है जो निष्पक्ष जांच का विषय है। साक्ष्यों के मुताबिक सहायक बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय कसया मे सुभाष 17 वर्ष 2 माह तैनात रहे। (16 अप्रैल – 2001 से 19 जून-2018 तक)। इस संबध में सुभाष प्रसाद यादव से उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया तो उन्होंने कहा कि उनकी नियुक्ति बिल्कुल सही है कहीं कोई फर्जी नही है। उन्होंने कहा कि परियोजना समाप्त होने के बाद परियोजना से जुड़े तमाम लोगों का एडी बेसिक ने बेसिक विभाग में समायोजन किया है। जब उनसे पूछा गया कि अनौपचारिक शिक्षा परियोजना के समाप्ति के बाद परिचारक को बेसिक में समायोजन से संबंधित कोई शासनादेश है इस पर सुभाष निरुत्तर हो गये। फिर खुद को सम्भालते हुए कहा कि विभाग के पास होगा। नोट – सुभाष के नियुक्ति व तैनाती से संबंधित खबर पढ़ें अगले खबर में।

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