कुशीनगर :: निर्जला व्रत के साथ शुरू हुआ छठी मैया का पर्व

0
IMG-20251026-WA1272

🔴 चार दिनों तक चलने वाला लोक आस्था व सूर्योपासना का महापर्व बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों का प्रमुख पर्व। 🛑 28 अक्टूबर मंगलवार को प्रात:काल अर्घ्य देने के साथ ही संपन्न होगा व्रत पर्व।

आदित्य प्रकाश श्रीवास्तव, कुशीनगर केसरी, कुशीनगर । लोक आस्था व सूर्योपासना का चार दिवसीय महापर्व शनिवार को नहाय-खाये के साथ प्रारंभ हो गया। 26 अक्टूबर रविवार को खरना, 27 अक्टूबर सोमवार को सूर्यदेव को सायंकालीन अर्घ्य तथा 28 अक्टूबर मंगलवार को प्रात:कालीन अर्घ्य देने के साथ ही व्रत-पर्व संपन्न होगा। चार दिनों तक चलने वाला यह महापर्व वैसे तो यह बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों का प्रमुख पर्व है, लेकिन समय के साथ अब दूसरे प्रदेश के लोग भी अब इस महापर्व को धूमधाम व श्रद्धाभाव से मनाने लगे हैं।

बताते चलें कि लोक आस्था व भगवान भास्कर की आराधना का महापर्व शनिवार को नहाया-खाया के साथ प्रारम्भ हो गया। रविवार को छठ को लेकर प्रातः उठकर व्रती महिलाओं ने गंगा स्नान कर विधि-विधान पूर्वक पूजा- अर्चना किया और दिन भर निर्जला व्रत रही। शाम को रोटी रसिआव (गुड वाल रसिआव) सात्विक भोजन ग्रहण किया। छठ पूजा की पूर्णाहुति मंगलवार को उगते हुए भगवान भास्कर को अध्य देने के बाद संपन्न होगी। यूपी और बिहार मे मनाये जाने वाला छठ महापर्व अब पूरे देश मे आस्था व विश्वास के साथ मनाया जाता है। कहना ना होगा कि शनिवार से नहाये खाये के साथ शुरू हुआ भगवान तपन का यह महापर्व उगते हुए भगवान मार्तड को अध्य देने तक कुल चार चरणो मे संपन्न होती है। कथावाचक व श्री चित्रगुप्त मंदिर के पीठाधीश्वर श्री अजयदास महाराज के अनुसार पहले दिन की पूजा के बाद से नमक का त्याग कर दिया जाता है। छठ पर्व के दुसरे दिन को खरना के रुप मे मनाया जाता है। इस दिन भूखे-प्यासे रहकर व्रती महिलाएं रसिआव का प्रसाद तैयार करती है। महत्वपूर्ण बात है कि यह खीर गन्ने अथवा गुड के रस की बनी होती है इसमे चीनी व नमक का प्रयोग नही किया जाता है। सायंकाल इस प्रसाद को ग्रहण करने के बाद माताए निर्जल व्रत की शुरुआत करती है। तीसरे दिन सोमवार की शाम डूबते हुए भगवान लोक प्रकाशक को अध्य देगी। चौथे व आखिरी दिन मंगलवार को उगते हुए भगवान गृहश्वेर की पूजा करेगी। उसके बाद व्रती महिलाए कच्चा दूध व प्रसाद ग्रहण करके व्रत व पूजा की पूर्णाहुति करेगी।

🔴 सूर्य और षष्ठी की पूजा

छठ महापर्व पर गीत षष्ठी देवी के गाए जाते हैं, लेकिन आराधना भगवान सूर्य की होती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, सूर्य और षष्ठी देवी भाई-बहन हैं। मान्यता है कि सुबह और शाम सूर्य की अरुणिमा में षष्ठी देवी निवास करती हैं। इसलिए भगवान सूर्य के साथ षष्ठी देवी की पूजा होती है।

🔴 डूबते और उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा

छठ पर्व के तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को पूर्ण उपवास रहकर व्रती माताए सायंकाल 5 बजकर 50 मिनट पर डूबते हुए भगवान कर्ता-धर्ता को अर्घ्‍य देगी।षष्ठी महापर्व की पूर्णाहुति चतुर्थ दिन उगते सूर्य को अर्घ्‍य देने के साथ संपन्न होती है। इस दिन सूर्योदय 6 बजकर 43 मिनट पर है। अर्घ्य देने के बाद व्रती महिलाएं पारन (अल्‍पाहार) करेंगी।

🔴 कैसे करें छठ पूजन

षष्ठी के दिन यानी सोमवार को पूर्वाह्न में वेदी पर जाकर छठ माता की पूजा करें। फिर घर लौट आएं। अपराहन घाट पर वेदी के पास जाए। पूजन सामग्री वेदी पर चढ़ाएं व दीप जलाएं। सूर्यास्त 5.50 बजे है, इसलिए अस्ताचलगामी सूर्य को दीप दिखाकर प्रसाद अर्पित करें। दूध और जल चढ़ाएं, फिर दीप जल में प्रवाहित करें। व्रता वेला (सुबह) में परिजनों के साथ घाट पर पहुंचें और व्रती माताएं पानी में खड़े होकर सूर्य उदय की प्रतीक्षा करें। सूर्य का लाल गोला जब दिखने लगे तो दीप अर्पित कर उसे जल में प्रवाहित करें। फिर हाथ से जल अर्पित करें। दूध चढ़ाएं और भगवान शुचि (सूर्य) को अर्पित करें।

🔴 पौराणिक-लोक कथाओं से गुंथा है छठ पर्व

लोक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव के तेज से उत्पन्न बालक स्कंद को छह कृतिकाओं ने अपना स्तनपान कराकर उसकी रक्षा की थी। उस समय स्कंद के छह मुख हो गए थे। कृतिकाओं द्वारा उन्हें दुग्धपान कराया गया था, इसलिए ये कार्तिकेय कहलाए। लोकमान्यता यह भी है कि यह घटना जिस मास में घटी थी उस मास का नाम कार्तिक पड़ गया इसलिए छठ मइया की पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को किया जाता है।

🔴 प्रसाद में अनिवार्य है ठेकुआ

सूर्य षष्ठी पूजा में ऋतुफल के अतिरिक्त आटा, गुड़ और घी से निर्मित ठेकुआ प्रसाद के रूप मे होना अनिवार्य है। इस पर सांचे से भगवान प्रकाश रुप के रथ का चक्र अंकित किया जाता है। पूजा सामग्री में पांच तरह के फल, मिठाइयां, गन्ना, केले, नारियल, नींबू, शकरकंद, अदरक नया अनाज शामिल होता है।

🔴 डाले में सजती है पूजा सामग्री

व्रती महिला सीमा देवी, शशि श्रीवास्तव व कामनी श्रीवास्तव कहती है महिलाएं पूजा सामग्री सजाती है जिसे पुरुष शाम को नए बांस के डाले में रखकर जलस्रोत के किनारे ले जाते है। महिलाएं पानी में खड़ी होकर अस्त होते हुए सूर्य को अर्घ्य देंगी । अगले दिन सुबह पूजा सामग्री के साथ अंकुरित चना, दही लेकर फिर घाट पर पहुंच पानी में खड़े होकर उदय होते सूर्य को अर्घ्य दिया जायेगा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed